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Showing posts from April, 2026

धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान के चेयरमैन श्री तस्वीर सिंह चपराना का संबोधन

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धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान के चेयरमैन का संबोधन आदरणीय मंचासीन अतिथिगण, विद्वान साथियों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और उपस्थित सभी सम्मानित नागरिकों, आप सभी को मेरा सादर नमस्कार। आज विश्व पुस्तक दिवस के इस पावन अवसर पर तिलक पुस्तकालय एवं वाचनालय, टाउन हॉल, मेरठ में आयोजित इस संगोष्ठी में आप सभी की गरिमामयी उपस्थिति हम सभी के लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है। मैं धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान की ओर से आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारे इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य समाज में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को पुनर्जीवित करना और पुस्तकों के महत्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना है। पुस्तकें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे जीवन की सच्ची मार्गदर्शक होती हैं, जो हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती हैं। तिलक पुस्तकालय का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। वर्ष 1886 से यह पुस्तकालय ज्ञान-वितरण और बौद्धिक विकास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। यहाँ लगभग 60,000 पुस्तकों का समृद्ध संग्रह उपलब्ध है, जिसमें साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र, विज्ञान और दर्शन जै...

इक नया कारोबार

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  इक नया कारोबार भूमिका समाज की संरचना जितनी संवेदनशील है, उतनी ही जटिल भी। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, माध्यम बदलते हैं—किन्तु कुछ प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं जो अपने स्वरूप को बदलकर भी निरंतर बनी रहती हैं। विशेषतः भावनाओं के दोहन और विश्वास के शोषण की प्रवृत्ति कोई नई नहीं है; यह सदैव से समाज के किसी न किसी कोने में विद्यमान रही है। अंतर केवल इतना है कि समय के साथ इसकी अभिव्यक्ति और विस्तार का प्रतिशत बदलता रहता है—कभी यह कम दिखाई देता है, तो कभी परिस्थितियाँ इसे अधिक व्यापक बना देती हैं। विजया डालमिया के प्रस्तुत शब्द इसी सतत चलने वाली सामाजिक वास्तविकता को उजागर करते हैं। यहाँ ‘नया कारोबार’ केवल एक रूपक नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो सरलता, विश्वास और भावनात्मक कोमलता को अपने लाभ के लिए साधन बना लेती है। विशेषकर वे महिलाएँ, जो अपने सहज विश्वास और संवेदनशील हृदय के कारण संबंधों को सच्चाई की दृष्टि से देखती हैं, कई बार इस छलावे का शिकार बन जाती हैं। यह भी एक यथार्थ है कि समाज में इस प्रकार की आशंकाएँ और पूर्वाग्रह हमेशा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे। इन्हें पूरी तर...

संघर्ष, संकल्प और सफलता की मिसाल है ज्योति धामा

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 🎙️ विशेष साक्षात्कार संघर्ष, संकल्प और सफलता की मिसाल है ज्योति धामा प्रश्न १. ज्योति जी, सबसे पहले आपको इस शानदार सफलता के लिए हार्दिक बधाई। 19वीं रैंक हासिल करने का अनुभव कैसा रहा? उत्तर : "बहुत-बहुत धन्यवाद। यह मेरे लिए सिर्फ एक परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, धैर्य और विश्वास की जीत है। जब परिणाम आया तो एक पल के लिए विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन अगले ही क्षण माता-पिता के चेहरे की खुशी देखकर लगा कि मेरी मेहनत सार्थक हो गई।" प्रश्न २. आपके इस सफर की शुरुआत कैसे हुई? क्या शुरू से ही सिविल सेवा का लक्ष्य था? उत्तर : "नहीं, शुरुआत में मेरा लक्ष्य शिक्षक बनने का था। मैंने डीएलएड भी किया था। लेकिन मेरी सहेली आंचल धामा ने मुझे सिविल सेवा की तैयारी के लिए प्रेरित किया। उसी दिन मैंने ठान लिया कि अब मुझे अपने जीवन को एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित करना है।" प्रश्न ३. एक साधारण किसान परिवार से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचना—यह यात्रा कितनी चुनौतीपूर्ण रही?** उत्तर : "चुनौतियां हर कदम पर थीं—संसाधनों की कमी, सही मार्गदर्शन का अभाव, और कई बार आत्म-संदेह भी। लेकिन मैंने ...

सफल युवा प्रतिभा दीपशिखा

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सफल युवा प्रतिभा दीपशिखा भूमिका समाज में अपनी मेहनत, लगन और स्पष्ट लक्ष्य के बल पर आगे बढ़ने वाली युवा प्रतिभाएँ हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनती हैं। ऐसी ही एक उभरती हुई प्रतिभा हैं दीपशिखा, जिन्होंने अपनी शिक्षा और निरंतर प्रयासों के दम पर  वर्क ऑफिसर जैसे महत्वपूर्ण पद पर सफलता अर्जित की है। पहले पटवारी के पद पर हुआ था पर ज्वॉइन नहीं किया फिर उत्तर प्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर हो गई फिर भी ज्वॉइन नही किया फिर जेआरएफ हुआ तथा शोध चल ही रहा है और पहले ही प्रयास में पीसीएस में चयन हो गया। साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर प्रशासनिक सेवा में अपनी पहचान बनाना उनके संघर्ष, अनुशासन और आत्मविश्वास ही का परिणाम है। दीपशिखा का चयन न केवल उनके परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह उन सभी युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और प्रयास निरंतर, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं होती। इसी प्रेरक यात्रा को जानने के लिए प्रस्तुत है दीपशिखा से एक विशेष बातचीत—प्रश्नोत्तर के रूप में। साक्षात्कार ...

भगवान् देवनारायण जी की प्रशस्ति में

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भगवान् देवनारायण जी की प्रशस्ति में देव की महिमा न्यारी 24 बगडावतों में था, सबसे महान सवाई भोज। मां भवानी व महादेव की, अखंड सेवा करता रोज।  पाकर वरदान महादेव से, 12 वर्ष की काया माया का। कुंआ बावड़ी यज्ञ हवन कर, व्रत लिया प्रजा की सेवा का।  वचन निभाने के खातिर, वैर कर लिया राणा से, जयमती का किया श्रृंगार, नरमुंडों की माला से। न्याय के लिए हुआ था, जैसे युद्ध महाभारत। खारी नदी का युद्ध भी था, वैसा ही बगड़ावत भारत।  माघ शुक्ल सप्तमी को, जन्मा था विष्णु अवतारी। जन्म नाम था उदय सिंह,  बाद में पड़ा देव चमत्कारी।  दीन दु:खियों की कर सेवा,  समाज में फैलाया उजियारा। अत्याचारी राणा से पा मुक्ति, गढ़ गोठा को पु:न बसाया।  कोढ़ियों का कोढ़ मिटाकर, कर दी कंचन सी काया। महादेव ने सवाई भोज को, 12 वर्ष की दी खूब माया।  कलयुग में भी खूब पूजाया, खूब बढ़ी महिमा चारों ओर। जय-जय कार हो रही है,  देवनारायण जी की चंहूओर।  हंसराज हंस देव जयंती को,  करता है सबसे यह आह्वन।  रोज प्रातः जल्दी उठकर, धरे देव जी का सब ध्यान। रचनाकार हंसराज हंस  बनेठा ...

व्यवस्थाएं क्यों चूक जाती हैं: जब व्यापक सोच सिमटने लगती है

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व्यवस्थाएं क्यों चूक जाती हैं जब व्यापक सोच सिमटने लगती है मानव सभ्यता का इतिहास केवल विकास की कहानी नहीं है, बल्कि यह निरंतर खोज, प्रयोग और आत्म-मंथन की यात्रा भी है। जीवन को समझने के प्रयास हमेशा चलते रहे हैं—कभी एक व्यक्ति के स्तर पर, तो कभी पूरे समाज के स्तर पर। यही व्यक्तिगत प्रयास आगे चलकर सामूहिक सहमति में बदलते हैं और उनसे व्यवस्थाएँ, नियम और सिद्धांत जन्म लेते हैं। लेकिन आज एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—यदि ये व्यवस्थाएँ इतनी सोच-समझकर बनाई गई थीं, तो फिर वे बार-बार असफल क्यों प्रतीत होती हैं? व्यापक सोच से संकीर्णता तक की यात्रा जब भी कोई व्यवस्था बनती है—चाहे वह धर्म हो, समाज हो या शासन—उसका आधार व्यापक सोच होती है। उसमें सभी के लिए स्थान होता है, सभी के हितों का ध्यान रखा जाता है। परंतु समय के साथ यही सोच धीरे-धीरे सिमटने लगती है। उदाहरण के लिए दुनिया के लगभग सभी धर्म—चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध परंपरा हो—सभी का मूल संदेश प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व का है। लेकिन आज हम देखते हैं कि इन्हीं धर्मों के अनुयायी कभी-कभी एक-दूसरे के विरोध में खड़े नजर आते हैं। यह धर्...

आज का आत्म उद्गम

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आज का आत्म उद्गम भूमिका   मानव जीवन केवल समय की निरंतरता नहीं, बल्कि भावों की गहराई और आत्मा की जागृति का एक सतत प्रवाह है। जब हम प्रत्येक दिन को केवल दिनचर्या का हिस्सा मानकर जीते हैं, तो जीवन एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। किंतु जब उसी दिन को “आत्म उद्गम” — अर्थात् भीतर से प्रस्फुटित होने वाले नवचेतन स्रोत — के रूप में देखा जाता है, तब वही साधारण दिन असाधारण अनुभवों में परिवर्तित हो जाता है। किशोर कुमार धनावत जी की प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी आत्मजागरण की ओर संकेत करती हैं। ये पंक्तियाँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि उत्साह कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि भीतर से उपजने वाली ऊर्जा है, जिसे हर दिन पुनः जागृत किया जा सकता है। “हर दिन उत्साह का, खुशी से मनायें हम” — यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है, जो हमें वर्तमान क्षण को उत्सव की तरह जीने की प्रेरणा देता है। इन पंक्तियों में स्नेह और समर्पण को समझने का आग्रह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज के समय में जहाँ संबंध अक्सर औपचारिकता और स्वार्थ के बीच उलझ जाते हैं, वहाँ “भाव को जानें हम” एक गहरी पुकार है — अपने भीतर के संवेदनशील...

🌷रात्रि चिंतन🌷 और 🌷कथन विश्लेषण का मंतव्य🌷

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🌷रात्रि चिंतन🌷 ऐसा लगता है कि सोचना और सोचते ही रहना एक रोग है और जो इस रोग से मुक्त है, वह ही स्वस्थ तथा धन्य है। साथ ही जो अपनों को समय देने को तैयार है वह सब कुछ पाने का अधिकारी हो जाता है। सुनें ऐसे मानो पहली बार सुन रहे हों तथा ना कहना भी सीखें। ऐसा कभी न दर्शाएं जैसे सब जानते हों। दृष्टिकोण से कभी भी स्वार्थी न बनें और न ही बहुत अंहकार करें। जीवन में विनम्रता और समझदारी को अपनाएं व किसी से ईर्ष्या द्वेष से पार पाना सीखें। सदैव सावधान रहें और प्रत्येक किस्म के जोखिम से स्वयं को दूर रखें। धैर्य से प्रतीक्षा करें और शांत रहें।  ॥ जय श्री राधे कृष्ण ॥ 🌷कथन विश्लेषण मंतव्य🌷 यह कथन अनेक छोटे-छोटे जीवन सूत्रों का संग्रह है, जिन्हें यदि क्रम में समझा जाए तो यह एक गहरी जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है। इसे सरल और अंतर्संबद्ध रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है— 1. विचारों का संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य है सोचना आवश्यक है, लेकिन लगातार सोचते रहना मन का रोग बन जाता है। इसका संकेत है कि व्यक्ति को अतिचिंतन (overthinking) से बचकर मन को शांत रखना चाहिए, क्योंकि शांति ही मानसिक स्वास्थ्य...

वर्ल्ड बाइपोलर दिवस: सरल समझ

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वर्ल्ड बाइपोलर दिवस सरल समझ हर साल 30 मार्च को वर्ल्ड बाइपोलर डे मनाया जाता है। यह दिन प्रसिद्ध चित्रकार Vincent van Gogh के जन्मदिन पर रखा गया है। इसका उद्देश्य लोगों को बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में जागरूक करना और इससे जुड़ी गलत धारणाओं को दूर करना है। यह है क्या? यह केवल सामान्य मूड बदलने की स्थिति नहीं है, बल्कि एक गंभीर मानसिक समस्या है। इसमें व्यक्ति के व्यवहार में दो तरह के बदलाव दिखते हैं— मेनिया : बहुत ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा बोलना, नींद कम आना, खुद को बहुत शक्तिशाली समझना। डिप्रेशन : गहरी उदासी, थकान, निराशा और किसी भी काम में मन न लगना। ये बदलाव व्यक्ति के जीवन के हर हिस्से—परिवार, समाज और काम—को प्रभावित कर सकते हैं। इस संबंधी जागरूकता क्यों जरूरी है? अक्सर लोग इसे समझ नहीं पाते और इसे स्वभाव या “पागलपन” कहकर नजरअंदाज कर देते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति और अधिक अकेला हो जाता है। जबकि सच यह है कि यह एक बीमारी है, कोई कमजोरी नहीं। क्या किया जा सकता है? * समय पर डॉक्टर की सलाह और दवाइयों से व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। * ऐसे लोगों को दया नहीं, बल्कि समझ और सहयोग की जरूरत होती है।...

जो भूल ही नहीं पाए

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  जो भूल ही नहीं पाए कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने विचारों, प्रेरणा और स्नेह के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के जीवन में भी प्रकाश फैलाते रहते हैं। मेरे आदरणीय चाचाजी, स्वर्गीय बृजेन्द्र मोहन साँख्यधर जी, ऐसे ही प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व थे। उनका जीवन सरलता, संवेदनशीलता और साहित्यिक चेतना से आलोकित था। वे शब्दों की शक्ति में गहरा विश्वास रखते थे और मानते थे कि लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और समय से संवाद का माध्यम है। जब भी उनसे मुलाकात होती, वे अत्यंत आत्मीयता से लेखन के लिए प्रेरित करते और कहते— “मन की सच्ची अनुभूति जब शब्दों में ढलती है, तभी वह साहित्य बनती है।” उनके ये शब्द मेरे लिए सदैव मार्गदर्शक रहे। उनकी अंग्रेज़ी में लिखी पुस्तक सम्भल का हिन्दी रूपान्तरण मेरे लिए केवल भाषाई परिवर्तन नहीं, बल्कि उनके विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने का एक विनम्र सेतु है। भागवत पुराण के अनुसार, सम्भल वह पवित्र स्थान है जहाँ कल्कि भगवान, जो कलियुग में अधर्म का विनाश करेंगे, प्रकट होंगे। यह स्थान केवल भौगोलिक दृष्ट...

भय से नहीं, संवाद और विश्वास से संवरते हैं बच्चों के व्यक्तित्व

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भय से नहीं, संवाद और विश्वास से  संवरते हैं बच्चों के व्यक्तित्व आज के बदलते सामाजिक परिवेश में बच्चों की परवरिश केवल अनुशासन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, संवाद और समझ की भी उतनी ही आवश्यकता है। अक्सर देखा जाता है कि एक ही रूटीन और लगातार दबाव के कारण बच्चे ऊबने लगते हैं। कभी उनका मन थक जाता है, कभी दिमाग उलझ जाता है और कई बार उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लग पाता। विशेषज्ञों का मानना है कि “ध्यान नहीं लग रहा” जैसे वाक्य के पीछे हमेशा कोई न कोई कारण होता है, लेकिन अभिभावक उस कारण को समझने के बजाय सीधे सख्ती या सज़ा का रास्ता चुन लेते हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ से समस्या शुरू होती है। बच्चों को सुधारने की मंशा में अक्सर माता-पिता अनजाने में उन्हें डरना सिखा देते हैं। परिणामस्वरूप, बच्चा पढ़ाई से नहीं बल्कि अपने ही अभिभावकों से दूर होने लगता है। डर के कारण वह चुप तो हो जाता है, लेकिन उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। वह पढ़ाई करता जरूर है, पर हर पन्ने के साथ उसका मनोबल टूटता जाता है। शिक्षाविदों का कहना है कि यदि बच्चा किसी कारणवश पीछे रह रहा है या लड़खड...