इक नया कारोबार

 इक नया कारोबार

भूमिका

समाज की संरचना जितनी संवेदनशील है, उतनी ही जटिल भी। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, माध्यम बदलते हैं—किन्तु कुछ प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं जो अपने स्वरूप को बदलकर भी निरंतर बनी रहती हैं। विशेषतः भावनाओं के दोहन और विश्वास के शोषण की प्रवृत्ति कोई नई नहीं है; यह सदैव से समाज के किसी न किसी कोने में विद्यमान रही है। अंतर केवल इतना है कि समय के साथ इसकी अभिव्यक्ति और विस्तार का प्रतिशत बदलता रहता है—कभी यह कम दिखाई देता है, तो कभी परिस्थितियाँ इसे अधिक व्यापक बना देती हैं।

विजया डालमिया के प्रस्तुत शब्द इसी सतत चलने वाली सामाजिक वास्तविकता को उजागर करते हैं। यहाँ ‘नया कारोबार’ केवल एक रूपक नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो सरलता, विश्वास और भावनात्मक कोमलता को अपने लाभ के लिए साधन बना लेती है। विशेषकर वे महिलाएँ, जो अपने सहज विश्वास और संवेदनशील हृदय के कारण संबंधों को सच्चाई की दृष्टि से देखती हैं, कई बार इस छलावे का शिकार बन जाती हैं।

यह भी एक यथार्थ है कि समाज में इस प्रकार की आशंकाएँ और पूर्वाग्रह हमेशा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे। इन्हें पूरी तरह समाप्त कर पाना शायद संभव नहीं, क्योंकि ये मानव प्रवृत्तियों के अंधकारमय पक्ष से उपजते हैं। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है—जागरूकता, आत्म-संरक्षण का कौशल और परिस्थिति की समझ। जो वर्ग इन आशंकाओं से अधिक प्रभावित होता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने भीतर विवेक, आत्मविश्वास और सतर्कता का विकास करे, ताकि वह भावनाओं के इस खेल में स्वयं को सुरक्षित रख सके।

प्रस्तुत कविता केवल एक घटना या स्थिति का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह एक चेतावनी है—एक दर्पण है, जिसमें समाज के उस चेहरे को देखा जा सकता है, जो अक्सर शब्दों की मिठास में अपने वास्तविक इरादों को छिपा लेता है। यह रचना पाठकों को न केवल संवेदनशील बनाती है, बल्कि उन्हें यह भी समझाने का प्रयास करती है कि बदलते समय में सुरक्षित रहने के लिए भावनात्मक सशक्तता और सजगता ही सबसे बड़ा सहारा है।

कविता

इन दिनों फैल रहा है

एक नया कारोबार

 कुछ भोली महिलाओं

 को बना लेते हैं वह

 अपना शिकार

 भावनाओं से उनकी

 खेल कर खेल

 करते हैं सुंदर शब्दों के वार

चाशनी भरी बातों के गहने पहनाते उन्हें हर

पल

सच्ची सजधज समझ महिलाएं सजती रहती

हर पल

इज्जत लूट ली जाती है 

नजरों से जब

शर्मसार हो जाती है

भावनाएं तब

संभालने वाला कोई

नहीं होता 

उनके

 व्यथा भरे हाथों को

 जब

 खामोशी घेर लेती है

 अनकहे जजबातों

 को तब ...

रचनाकार

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका

उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)

हैदराबाद 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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