देवरानी-जेठानी
देवरानी-जेठानी
भूमिका
भारतीय पारिवारिक संरचना में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो जन्म से नहीं, बल्कि परिस्थिति, परंपरा और साथ निभाने की भावना से जन्म लेते हैं—और समय के साथ आत्मीयता की उस ऊँचाई को छू लेते हैं, जहाँ रक्त संबंध भी पीछे छूट जाते हैं। देवरानी और जेठानी का रिश्ता भी ऐसा ही एक अद्भुत, बहुरंगी और संवेदनशील संबंध है।
विजया डालमिया की यह कविता इसी रिश्ते के विविध रंगों को अत्यंत सहजता और आत्मीयता के साथ उकेरती है। यहाँ दो स्त्रियाँ हैं—स्वभाव से भिन्न, जिम्मेदारियों में अलग, पर एक ही सूत्र में बंधी हुई। कहीं वे घर की धुरी हैं, तो कहीं एक-दूसरे की संबल; कहीं हल्की तकरार है, तो कहीं चाय की चुस्कियों में घुलती मिठास। यह कविता दिखाती है कि कैसे ये दोनों महिलाएँ अपने-अपने दायित्वों को निभाते हुए, एक-दूसरे के जीवन की सहेली, हमराज़ और शक्ति बन जाती हैं।
कविता में पारिवारिक जीवन के छोटे-छोटे दृश्य—रसोई की खुशबू, त्योहारों की रौनक, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल, और आपसी संवाद—इतनी जीवंतता से उभरते हैं कि पाठक स्वयं उस वातावरण का हिस्सा बन जाता है। विशेष रूप से यह भाव कि “जो किसी से ना कह सकी, आपस में कहकर हल्की हो जाती है”—इस रिश्ते की गहराई और विश्वास को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करता है।
विजया डालमिया ने इस रचना के माध्यम से यह संदेश दिया है कि रिश्ते केवल निभाए नहीं जाते, उन्हें संवारा जाता है—समझ, सहनशीलता, और प्रेम के रंगों से। देवरानी-जेठानी का यह संबंध जब प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर सहयोग और अपनत्व का रूप ले लेता है, तब वह सगी बहनों जैसा मधुर और सशक्त बन जाता है।
यह कविता न केवल एक रिश्ते का चित्रण है, बल्कि उस भारतीय पारिवारिक संस्कृति का उत्सव भी है, जहाँ अलग-अलग व्यक्तित्व मिलकर एक सुंदर सामंजस्य रचते हैं।
कविता
वो दोनों हैं जुदा-जुदा
फिर भी दोनों साथ-साथ
एक का अंदाज निराला
दूसरी के भाव हैं आला
छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को
दोनों ने मिल-जुल कर संभाला
एक के हाथ चटपटा कटोरा नमकीन
तो दूजी बनाए हर मिठाई बेहतरीन
एक घर पर बच्चे-बूढ़े
सबको प्यार से संभाले
दूजी बाहर के दायरे में बंधी
घर के कर्तव्य को पाले
मुसीबत आने पर दोनों
एक दूजे का सहारा बन जाती हैं
कड़वी तकरार को चाय की
मीठी चुस्की पर सलटाती हैं
जो किसी से ना कह सकी
आपस में कहकर
हल्की हो जाती हैं
देवरानी-जेठानी गले लगकर
सहेलियों सी निखर जाती हैं
साथ खातीं..साथ सपने देखतीं
तीजों पर झूलों की
मस्ती में झूलतीं
होली पर रंगीली बनकर
मस्ती के रंग बिखेर जाती हैं
दिवाली पर लक्ष्मी बनकर
घर को जगमगाती हैं
डाली से टूट कर्तव्य की चक्की में
खुशी से पीस जाती है
मेहंदी की तरह ससुराल रूपी
हाथों में रच बस जाती हैं
सुख-दु:ख आपस में बतिया
प्रेम का साझा चूल्हा जलाती हैं
संयम समर्पण के गहने पहनकर
देवरानी-जेठानी सगी बहनों
सी हो जाती हैं।
रचनाकार
विजया डालमिया
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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