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Showing posts from May, 2026

सत्संकल्प

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  सत्संकल्प मनुष्य के मूल्यांकन की सच्ची कसौटी सृजक : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य स्रोत :‘ युग निर्माण सत्संकल्प ’ भूमिका मनुष्य को पहचानने और उसका मूल्यांकन करने का प्रश्न हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। सामान्यतः समाज व्यक्ति की सफलता, धन, पद, योग्यता या प्रसिद्धि को देखकर उसका सम्मान करता है। परंतु क्या यही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान है? इस विषय में महान विचारक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का एक महत्वपूर्ण सत्संकल्प हमें सही दिशा दिखाता है। उनके अनुसार, मनुष्य का मूल्य उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके श्रेष्ठ विचारों और सत्कर्मों से किया जाना चाहिए। यदि समाज इस सिद्धांत को अपनाए, तो सामाजिक वातावरण अधिक नैतिक, प्रेरणादायक और मानवीय बन सकता है। सत्संकल्प का संदेश आचार्यश्री के अनुसार मनुष्य की असली पहचान उसकी सफलताओं, योग्यताओं या वैभव से नहीं होती। व्यक्ति कितना बड़ा है, इसका निर्णय उसके सद्विचार और सत्कर्म करते हैं। आज के समय में सफलता कई बार धन, सिफारिश, प्रभाव या चापलूसी से भी प्राप्त हो जाती है। वहीं अनेक लोग अपनी मेहनत, ईमानदारी और प्रतिभा से आगे बढ़ते हैं। लेकिन समाज अक...

आगे बढ़ने के जुनून से जगती अलख

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आगे बढ़ने के जुनून से जगती अलख (एक समाजशास्त्रीय दृष्टि) गुर्जर समाज की नई पीढ़ी आज शिक्षा के क्षेत्र में वह इतिहास लिख रही है, जो कभी समाज के पुरखों ने अपने सपनों में देखा था। कशिश कसाना ने सांख्यिकी विभाग की प्रतियोगी परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त कर समाज को गौरवान्वित किया है। उनकी यह सफलता यह सिद्ध करती है कि यह समाज अपनी जड़ों से जुड़ा होते हुए भी आधुनिकता की ऊँचाइयों को छूने का सामर्थ्य रखता है। कशिश की उपलब्धि ने ग्राम गनौली के बॉबी बैंसला और तुगलकाबाद के साहिल बिधूड़ी की यादें ताज़ा कर दी हैं — जिन्होंने अपने-अपने प्रतियोगी परीक्षाओं में रैंक वन प्राप्त कर समाज की प्रतिभा को नई पहचान दी। बॉबी बैंसला वर्तमान में केंद्रीय पीएफ विभाग में कार्यरत हैं, जबकि साहिल बिधूड़ी का इसरो में चयन शिक्षा और अनुशासन की अटूट मिसाल है। इन तीनों युवाओं की सफलता ने समाज में यह विश्वास दोहराया है कि दिशा सही हो तो हर समुदाय स्वयं अपना भविष्य गढ़ सकता है। शिक्षा का दीप — ‘तथास्तु’ का संदेश गाजियाबाद के शैक्षिक समूह ‘तथास्तु’ के संयोजक विकास नागर का कहना है —  “हमारा उद्देश्य केवल सफलता नहीं, बल...

नवल विचार

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  नवल विचार सकारात्मक ऊर्जा से बनें बधाई के पात्र  बच्चों के नवाचारों संबंधी भावों का उद्गार  राजस्थान के जनपद सवाई माधोपुर में एक शिक्षालय में नियुक्त उपप्राचार्य सुनिता मीना द्वारा नित नए नवाचार  विद्यालय में किए जा रहे हैं।  सामाजिक कार्यों, पर्यावरण संरक्षण आदि क्षेत्रों में भी वे लगातार सक्रिय रहती है। उनके जनहितकारी कार्यों, सामाजिक, साहित्यिक योगदान के कारण आए दिन समाचार पत्रों में भी उनकी चर्चा रहती है। पूरे सवाई माधोपुर में वह चर्चा में रहती हैं। विद्यालय की छात्राएं भी उनके कार्यों से प्रभावित होकर अक्सर उनसे पूछती रहती हैं कि  आप इतने एक्टिव कैसे रहते हो?  विविध दायित्वों को निभाने के बावजूद भी इतना सब कैसे कर लेते हो ?  इसके अतिरिक्त विद्यालय के अन्य अध्यापक आपको दीवारों पर चलने वाली और पत्तों पर नाचने वाली की उपाधि देते हैं । उनका मानना है कि आपके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है और आप कुछ मिनट में ही उस कार्य को कर देती हो। तब वो बच्चों को समझाती हैं कि पहले स्व की पहचान करें। अपनी काबिलियत पर भरोसा करें। ध्यान, योग करके दिमाग को स्थिर...

नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे

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नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे बदलाव की शुरुआत स्वयं से हम अक्सर अपने जीवन में आने वाली परेशानियों का कारण दूसरों को मान लेते हैं। हमें लगता है कि यदि सामने वाला बदल जाए, परिस्थितियाँ बदल जाएँ या लोग हमारी सोच के अनुसार व्यवहार करने लगें, तो जीवन सरल और सुखद हो जाएगा। परंतु क्या कभी हमने यह सोचा है कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से भी हो सकती है? सच तो यह है कि जब हम अपनी नज़र बदलते हैं, तब हमारे सामने के नज़ारे भी बदलने लगते हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी प्रवृत्ति यह है कि वह दूसरों की कमियाँ जल्दी देख लेता है, लेकिन अपने भीतर झाँकने से बचता है। हम अक्सर यह सोचते रहते हैं कि फलाँ व्यक्ति ऐसा क्यों है, रिश्ते वैसे क्यों नहीं हैं, या परिस्थितियाँ हमारे मन के अनुसार क्यों नहीं चल रहीं। जबकि असली प्रश्न यह होना चाहिए कि मैं अपने भीतर क्या सुधार ला सकता हूँ? जब हम थोड़ी देर रुककर स्वयं का परीक्षण करते हैं, तब हमें समझ आने लगता है कि जीवन में बहुत कुछ हमारे अपने व्यवहार और सोच पर निर्भर करता है। कभी हम अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते, कभी छोटी-छोटी बातों को दिल में बैठा लेते हैं, तो कभी बिना सोचे-स...

हमारा समय, सुकून और हम - विजया डालमिया

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हमारा समय, सुकून और हम समय हमेशा अपनी रफ्तार से चलता है, लेकिन सुकून उसकी गति में नहीं, हमारे मन की स्थिति में छिपा होता है। कभी हमारे पास समय बहुत होता है, पर मन बेचैन रहता है; और कभी जिम्मेदारियों के बीच भी कुछ पल ऐसे मिल जाते हैं, जो आत्मा को ठहरा देते हैं। आज का मनुष्य समय के पीछे भागते-भागते खुद से दूर होता जा रहा है। घड़ी की सुइयों को पकड़ने की कोशिश में वह अपनों की हँसी, रिश्तों की गर्माहट और अपने भीतर की शांति कहीं पीछे छोड़ देता है। हम भूल जाते हैं कि सुकून किसी मंज़िल का नाम नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है। कभी सुबह की चाय के साथ कुछ पल चुप बैठ जाना, कभी पुराने गीत सुन लेना, कभी अपनों से बिना किसी कारण बात कर लेना— यही छोटे-छोटे क्षण हमारे भीतर सुकून के बीज बोते हैं। समय हमारा है, पर सुकून तभी हमारा बनता है जब हम खुद को समय देना सीखते हैं। क्योंकि अंततः जीवन यह नहीं पूछता कि हमने कितना पाया, बल्कि यह पूछता है कि हमने कितना जीया। “समय बीत जाता है, पर सुकून से जिए हुए पल स्मृतियों में हमेशा जीवित रहते हैं।” सृजक   श्रीमती विजया डालमिया  राष्ट्रीय संयोजिका  उलझन सु...