हमारा समय, सुकून और हम - विजया डालमिया
हमारा समय,
सुकून और
हम
समय हमेशा अपनी रफ्तार से चलता है, लेकिन सुकून उसकी गति में नहीं, हमारे मन की स्थिति में छिपा होता है। कभी हमारे पास समय बहुत होता है, पर मन बेचैन रहता है; और कभी जिम्मेदारियों के बीच भी कुछ पल ऐसे मिल जाते हैं, जो आत्मा को ठहरा देते हैं।
आज का मनुष्य समय के पीछे भागते-भागते खुद से दूर होता जा रहा है। घड़ी की सुइयों को पकड़ने की कोशिश में वह अपनों की हँसी, रिश्तों की गर्माहट और अपने भीतर की शांति कहीं पीछे छोड़ देता है। हम भूल जाते हैं कि सुकून किसी मंज़िल का नाम नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है।
कभी सुबह की चाय के साथ कुछ पल चुप बैठ जाना, कभी पुराने गीत सुन लेना, कभी अपनों से बिना किसी कारण बात कर लेना— यही छोटे-छोटे क्षण हमारे भीतर सुकून के बीज बोते हैं।
समय हमारा है, पर सुकून तभी हमारा बनता है जब हम खुद को समय देना सीखते हैं। क्योंकि अंततः जीवन यह नहीं पूछता कि हमने कितना पाया, बल्कि यह पूछता है कि हमने कितना जीया।
“समय बीत जाता है,
पर सुकून से जिए हुए पल
स्मृतियों में हमेशा जीवित रहते हैं।”
सृजक






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