बाजार की उलझन
बाजार की उलझन प्रचुर विकल्प होने पर भी असमंजस नई दिल्ली हो या कोई अन्य छोटा या बड़ा शहर आजकल बाजार में घूमने जाएँ तो सिर चकरा जाता है। मोबाइल खरीदना हो या टीवी, फ्रिज, जूते या कपड़े अथवा कुछ अन्य — हर चीज के सैकड़ों मॉडल नजर आते हैं। हर ब्रांड अपना प्रोडक्ट सबसे अच्छा बताता है। लेकिन आखिर में इतना भ्रम हो जाता है कि फैसला लेना ही मुश्किल हो जाता है। यह समस्या सिर्फ आम आदमी की नहीं , बल्कि व्यापार करने वालों की भी है। जितने ज्यादा विकल्प, उतनी ज्यादा दुविधा। आखिर, क्यों हो रहा है ऐसा? यूज़ एंड थ्रो संस्कृति कंपनियाँ अब सामान को लंबे समय तक चलने वाला नहीं बनातीं। वे जानबूझकर ऐसी चीजें बनाती हैं जो दो-तीन साल में पुरानी लगने लगे। उदाहरण लीजिए मोबाइल फोन का। हर साल नया मॉडल आता है। कैमरा में बस एक पिक्सल ज्यादा, चार्जिंग थोड़ी तेज, या नया कलर — बस इतनी सी छोटी बदलाव के नाम पर कीमत 15 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा दी जाती है। पुराना फोन अभी भी अच्छा चल रहा होता है, लेकिन मार्केटिंग इतनी जोरदार होती है कि लगता है बिना नए फोन के आपका जीवन अधूरा है। इसी तरह टीवी, वॉशिंग मशीन, एसी — हर चीज में यह...