सफर तो करना पड़ेगा
भूमिका जीवन स्वयं एक सतत सफर है — जहाँ रुकना ठहरना नहीं, बल्कि आगे बढ़ते रहना ही अस्तित्व का प्रमाण है। “ सफर तो करना पड़ेगा ” शीर्षक कविता उसी जीवन यात्रा की अनिवार्यता को स्वर देती है। यह कविता बताती है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, समय किसी के लिए नहीं ठहरता। मंज़िलें अक्सर धुंधली होती हैं, रास्ते कठिन और अनजाने, परंतु चलना फिर भी पड़ता है — क्योंकि यही चलना जीवन का सार है। यह रचना प्रेरित करती है कि भय, निराशा या असफलता के बावजूद मनुष्य को अपनी दिशा और विश्वास बनाए रखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए, क्योंकि ठहराव ही वास्तविक हार है। कविता सफ़र तो करना पड़ेगा। स्वयं को गढ़ना पड़ेगा।। कंटकों से राह निर्मित , पद मगर प्रत्याहरित ना। अनवरत पदचाप मेरी , दृष्टि मेरी संकुचित ना ।। तीक्ष्ण पाषाणों में मंज़िल, पाँव तो धरना पड़ेगा । सफ़र तो करना पड़ेगा। स्वयं को गढ़ना पड़ेगा।। नग्न पदचिह्नों को देखो, उष्ण मिट्टी के हृदय पर । भग्न भावों को लिए मैं , सतत् हूँ अपने सफ़र पर ।। चित्रपट है जो मृदा पर , रक्त से भरना पड़ेगा । सफ़र तो करना पड़ेगा । स्वयं को गढ़ना पड़ेगा ।। रचनाकार @...dAyA s...