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Showing posts from March, 2026

शब्दों से समझ

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शब्दों से समझ "अपने..तो ना कभी इम्तिहान लेते है, ना कभी इम्तिहान देते हैं। अरे! अपने तो वो हैं....... जो बारिश में भीगे चेहरे पर भी.., आँसुओं को पहचान लेते हैं।" अज्ञात के द्वारा रची गई ऊपर दी पंक्तियों में रिश्तों की सच्चाई, अपनापन और भावनात्मक गहराई को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है, लेकिन इनके भीतर जीवन का बड़ा सत्य छिपा है। सरल भावार्थ और व्याख्या कवि कहना चाहता है कि “अपने” वे लोग नहीं होते जो हमें हर समय परखते रहें, हमारी परीक्षा लेते रहें या हमें अपने प्रेम को सिद्ध करने के लिए मजबूर करें। सच्चे रिश्तों में कोई परीक्षा नहीं होती, वहाँ विश्वास होता है, सहजता होती है। आज के समय में अक्सर रिश्ते शर्तों और अपेक्षाओं पर टिके होते जा रहे हैं—“अगर तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हारा हूँ”—परन्तु ये पंक्तियाँ बताती हैं कि असली अपनापन इन सबसे परे होता है। “अरे! अपने तो वो हैं…” यहाँ कवि एक गहरी परिभाषा देता है—अपने वे हैं जो बिना कहे, बिना जताए, हमारे मन की स्थिति को समझ लेते हैं। “जो बारिश में भीगे चेहरे पर भी.., आँसुओं को पहचान लेते हैं।” यह सबसे भावपूर्ण पंक्ति है। इसका अर...

रात्रि चिंतन - ३

🌷रात्रि चिंतन🌷 रिश्तों की पाठशाला वहीं चलती है जहां राजनीति और गणित संबंधी विषय न हों। मोबाइल ने आज घड़ी, कैमरा, कैलेंडर और अलार्म जैसे साधन छीन लिये हैं। हमारा प्रण हो कि अब इसे अपने बच्चों का समय और बचपन छीनने नहीं देना है, क्योंकि मोबाइल तो चार्ज हो सकता है, पर बचपन कभी भी नहीं लौटता। पर यह प्रण पूरा करने के लिए आजकल के माँ बाप के पास समय कहाँ है? उन्होंने तो अपनी और बच्चों की लाइफ  सिक्योर करने की जिम्मेदारी उठा रखी है और कर वह भी नहीं पा रहे। सावधान! सोशल मिडिया सब ही को अकेला करता जा रहा।  ॥ जय श्री राधे कृष्ण ॥ 🌷सूक्ष्म विश्लेषण🌷 यह चिंतन आधुनिक जीवन की उस सूक्ष्म विडंबना को उजागर करता है, जहाँ संबंधों की ऊष्मा धीरे-धीरे तर्क, गणना और स्वार्थ की परतों में दबती जा रही है। “रिश्तों की पाठशाला” का अर्थ केवल संबंध निभाना नहीं, बल्कि उन्हें समझना, महसूस करना और बिना किसी लाभ-हानि के स्वीकार करना है। जैसे ही इसमें “राजनीति” (स्वार्थ, चालाकी) और “गणित” (लाभ-हानि का हिसाब) प्रवेश करते हैं, संबंधों की सहजता समाप्त होने लगती है। मोबाइल के संदर्भ में लेखक ने अत्यंत सटीक प्रतीक...

युद्ध – एक व्यर्थ कोलाहल

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युद्ध – एक व्यर्थ कोलाहल भूमिका   मानव सभ्यता के लंबे इतिहास में युद्ध कभी विजय का प्रतीक बना, तो कभी पराजय का। परंतु जब हम उसकी गहराइयों में उतरते हैं, तो स्पष्ट होता है कि युद्ध का शोर जितना ऊँचा होता है, उसके पीछे उतना ही गहरा सन्नाटा छिपा होता है। यही सन्नाटा उजड़े घरों का, बिछड़े अपनों का और खोई हुई मानवता का साक्षी बनता है। डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ की यह कविता “युद्ध: एक व्यर्थ कोलाहल” इसी कड़वे सत्य को अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है। कवयित्री ने युद्ध के बाहरी वैभव और आंतरिक विनाश के बीच के विरोधाभास को बड़ी सादगी से सामने रखा है। खेतों की हरियाली से लेकर घर के दीप तक—हर प्रतीक के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि युद्ध किसी की जीत नहीं, बल्कि समूची मानवता की हार है। यह कविता केवल युद्ध का विरोध नहीं करती, बल्कि एक वैकल्पिक मार्ग भी सुझाती है—संवाद, प्रेम और सहअस्तित्व का मार्ग। जब कवयित्री गौतम बुद्ध को पुनः खोजने का आह्वान करती हैं, तो वह दरअसल करुणा, शांति और विवेक की उस ज्योति को पुनर्जीवित करने की बात करती हैं, जो आज के समय में अत्यंत आवश्यक है। “...

“क्या सच में पहले का समय बेहतर था?” — यादों की धूप और सच की छांव

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“क्या सच में पहले का समय बेहतर था?” यादों की धूप और सच की छांव कभी-कभी शाम के शांत क्षणों में, जब हम अपने अतीत की खिड़की खोलते हैं, तो यादों की एक मधुर धूप भीतर उतर आती है। बचपन की गलियाँ, स्कूल की घंटियाँ, पुराने दोस्त, और परिवार के साथ बिताए वे सरल दिन—सब कुछ जैसे किसी सुंदर चित्र की तरह मन में उभरता है। और तभी मन कह उठता है— “वो दिन भी क्या दिन थे… आज से कहीं बेहतर!” लेकिन क्या सच में ऐसा है? या यह हमारी स्मृतियों का एक सजा-संवरा हुआ आईना है, जिसमें हम केवल उजाले को ही देखना चाहते हैं? प्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर ने इसी धारणा को बहुत सहज शब्दों में चुनौती दी है। उनका कहना है कि “दुनिया पहले बेहतर थी”—यह एक रूमानी कल्पना है, जो वास्तविकता से कहीं दूर है। दरअसल, हम सब अपने अतीत के साथ एक भावनात्मक रिश्ता रखते हैं। यह रिश्ता इतना गहरा होता है कि हम उस समय की कठिनाइयों को धीरे-धीरे भुला देते हैं और केवल सुखद पलों को सहेज कर रखते हैं। जरा अपने ही जीवन की ओर लौटकर देखिए— क्या स्कूल के वे दिन सच में इतने आसान थे? सुबह की ठंडी हवा में नींद से जूझते हुए उठना, अधूरे होमवर्क का डर, शिक्षक की डां...

व्याख्यान का आँखों देखा हाल — डॉ. राकेश राणा

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व्याख्यान का आँखों देखा हाल  — डॉ. राकेश राणा 25 मार्च का दिन मेरे लिए एक विशेष अनुभव लेकर आया। एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा आयोजित “साहित्य और जेन-ज़ी: समझ और चुनौतियाँ” विषय पर व्याख्यान में सहभागी बनने का अवसर मिला। जैसे ही मैं महाविद्यालय के ऑडिटोरियम में पहुँचा, वहाँ का उत्साहपूर्ण वातावरण देखकर मन प्रसन्न हो उठा। विद्यार्थियों और प्राध्यापकों की सक्रिय उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि विषय कितना प्रासंगिक और आकर्षक है। कार्यक्रम का आरंभ अत्यंत गरिमामय ढंग से हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. विकास शर्मा जी का मंच पर आगमन हुआ, जिनकी विद्वता और सरल अभिव्यक्ति शैली ने आरंभ से ही सभी को बाँध लिया। उन्होंने जब यह कहा कि “भारत की जेन-ज़ी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है”, तो सभागार में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता महसूस हुआ। उनके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के संतुलन की स्पष्ट झलक थी। व्याख्यान के दौरान उन्होंने जेन-ज़ी और साहित्य के बदलते संबंधों पर जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, वह अत्यंत विचारोत्तेजक था। डिजिटल युग में युवाओं की बदलती रुचियों, उनकी ...

विश्रामावस्था का चिंतन

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🌷रात्रि चिंतन🌷 खुशियों का खजाना तभी बढ़ता है, जब दिल में शुभ भाव हों। ध्यान रहे कि जब हम नहीं थे, तब भी दुनिया आराम से चल रही थी और जब हम नहीं होंगे, तब भी चलती रहेगी। इसलिए अपने इस थोड़े से अस्तित्व को दुःखद बनाने के बजाय उसे उत्सव में बदलने में अपनी ऊर्जा लगाएँ। समझ लें कि ज़िंदगी एक खेल है, जिसमें चयन हमें ही करना है—कि हम इसे समझदारी से खेलें या हालात के हाथों का खिलौना बन जाएँ। और! यदि हम स्वयं को ईश्वर के हाथों की कठपुतली मानते हैं, तो उस परम शक्ति पर विश्वास रखते हुए सहजता और संतुलन के साथ जीवन जीना सीखें। सृजक ( मूल पाठ ) प्रमिला त्रिवेदी जी सहयोग ( संशोधन ) 🌷सूक्ष्म विश्लेषण 🌷 जीवन को समझने की एक सहज दिशा रात्रि का समय केवल विश्राम का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी होता है। जब दिनभर की भागदौड़ थम जाती है, तब मन अपने आप जीवन के गहरे प्रश्नों की ओर मुड़ता है। प्रस्तुत “रात्रि चिंतन” भी ऐसे ही कुछ सरल लेकिन गहन विचारों को सामने रखता है, जो हमें जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देते हैं। सबसे पहले यह विचार कि *“खुशियों का खजाना तभी बढ़ता है, जब दिल में शुभ भाव हों”* हमें य...