युद्ध – एक व्यर्थ कोलाहल

युद्ध – एक व्यर्थ कोलाहल

भूमिका 

मानव सभ्यता के लंबे इतिहास में युद्ध कभी विजय का प्रतीक बना, तो कभी पराजय का। परंतु जब हम उसकी गहराइयों में उतरते हैं, तो स्पष्ट होता है कि युद्ध का शोर जितना ऊँचा होता है, उसके पीछे उतना ही गहरा सन्नाटा छिपा होता है। यही सन्नाटा उजड़े घरों का, बिछड़े अपनों का और खोई हुई मानवता का साक्षी बनता है।

डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ की यह कविता “युद्ध: एक व्यर्थ कोलाहल” इसी कड़वे सत्य को अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है। कवयित्री ने युद्ध के बाहरी वैभव और आंतरिक विनाश के बीच के विरोधाभास को बड़ी सादगी से सामने रखा है। खेतों की हरियाली से लेकर घर के दीप तक—हर प्रतीक के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि युद्ध किसी की जीत नहीं, बल्कि समूची मानवता की हार है।

यह कविता केवल युद्ध का विरोध नहीं करती, बल्कि एक वैकल्पिक मार्ग भी सुझाती है—संवाद, प्रेम और सहअस्तित्व का मार्ग। जब कवयित्री गौतम बुद्ध को पुनः खोजने का आह्वान करती हैं, तो वह दरअसल करुणा, शांति और विवेक की उस ज्योति को पुनर्जीवित करने की बात करती हैं, जो आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

“युद्ध: एक व्यर्थ कोलाहल” केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि यदि हम अभी भी नहीं संभले, तो यह कोलाहल आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल वीरानियाँ ही छोड़ेगा। साथ ही यह एक आशा भी है कि यदि हम संवाद को अपनाएँ, तो इस धरती को फिर से एक पावन उपवन में परिवर्तित किया जा सकता है।

यह कविता पाठक को सोचने, ठहरने और अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करती है—कि सच्ची विजय आखिर है क्या?

 कविता

​खेतों की हरियाली निगलकर, बारूदी धुँआ छाता है,

इंसान जिसे जीत कहता है, वो अपनों का सन्नाटा है।


नक्शों पर जो लकीरें खिंचतीं, वो लहू से नहलाई हैं,

सरहद की हर एक फतह असल में, मानवता की रुसवाई है।


​शस्त्रों के ऊँचे ढेरों पर, कैसी ये सुरक्षा की माया?

बुझ गया घर का दीप अगर, तो क्या पाया, क्या गंवाया?


वो जीत नहीं जो सर काट दे, और आँगन को सूना कर दे,

विजय वही जो नफ़रत मिटाकर, प्रेम का अमृत भर दे।


​आओ बुद्ध को फिर से ढूँढें, युद्ध को हम ठुकरा दें,

अगली पीढ़ी को हम तलवार नहीं, बस एक खुला आकाश दें।


संवाद की भाषा बोलें अब, हथियारों को मौन करें,

धरती को श्मशान नहीं,

 हम फिर से पावन उपवन करें।

सृजक

डॉ दक्षा जोशी 'निर्झरा'

स्थानीय संपादिका, 

उलझन सुलझन 

(लेडीज विंग) 

अहमदाबाद (गुजरात) 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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