व्याख्यान का आँखों देखा हाल — डॉ. राकेश राणा
व्याख्यान का आँखों देखा हाल
— डॉ. राकेश राणा
25 मार्च का दिन मेरे लिए एक विशेष अनुभव लेकर आया। एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा आयोजित “साहित्य और जेन-ज़ी: समझ और चुनौतियाँ” विषय पर व्याख्यान में सहभागी बनने का अवसर मिला। जैसे ही मैं महाविद्यालय के ऑडिटोरियम में पहुँचा, वहाँ का उत्साहपूर्ण वातावरण देखकर मन प्रसन्न हो उठा। विद्यार्थियों और प्राध्यापकों की सक्रिय उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि विषय कितना प्रासंगिक और आकर्षक है।
कार्यक्रम का आरंभ अत्यंत गरिमामय ढंग से हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. विकास शर्मा जी का मंच पर आगमन हुआ, जिनकी विद्वता और सरल अभिव्यक्ति शैली ने आरंभ से ही सभी को बाँध लिया। उन्होंने जब यह कहा कि “भारत की जेन-ज़ी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है”, तो सभागार में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता महसूस हुआ। उनके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के संतुलन की स्पष्ट झलक थी।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने जेन-ज़ी और साहित्य के बदलते संबंधों पर जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, वह अत्यंत विचारोत्तेजक था। डिजिटल युग में युवाओं की बदलती रुचियों, उनकी त्वरित संतुष्टि की प्रवृत्ति और गहन अध्ययन से दूरी जैसी चुनौतियों को उन्होंने बहुत सहजता से सामने रखा। मुझे विशेष रूप से यह बात प्रभावित कर गई कि उन्होंने साहित्य को केवल पुस्तकों तक सीमित न मानकर उसे सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर भी जीवंत रूप में स्वीकार किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो. निशा जी के विचार भी उतने ही प्रेरणादायक रहे। उन्होंने भारतीय युवाओं की संवेदनशीलता और उनके भीतर निहित राष्ट्रप्रेम को जिस आत्मीयता से व्यक्त किया, वह मन को छू गया। वहीं, विशिष्ट अतिथि प्रो. उदयवीर सिंह ने युवाओं को पश्चिमी प्रभावों के अंधानुकरण से बचने और भारतीय मूल्यों को अपनाने का जो संदेश दिया, वह अत्यंत सारगर्भित था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डॉ. संजय सिंह के उद्बोधन ने पूरे आयोजन को एक सार्थक दिशा प्रदान की। उन्होंने ऐसे आयोजनों की आवश्यकता और उपयोगिता पर बल देते हुए विद्यार्थियों के समग्र विकास की बात कही।
प्रश्नोत्तर सत्र मेरे लिए सबसे रोचक रहा। विद्यार्थियों ने जिस उत्साह और जिज्ञासा के साथ अपने प्रश्न रखे, उससे यह स्पष्ट हुआ कि वे न केवल सुन रहे थे, बल्कि विषय को गहराई से समझने का प्रयास भी कर रहे थे। यह संवाद कार्यक्रम की आत्मा जैसा लगा।
संचालन कर रही डॉ. रिया देशवाल जी ने पूरे कार्यक्रम को अत्यंत सहज और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया। अंत में प्रो. सुरेखा अहलावत जी द्वारा व्यक्त किया गया आभार, पूरे आयोजन की गरिमा के अनुरूप था।
विशेष रूप से मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि विभाग के शोधार्थियों को भी इस मंच पर सम्मानित किया गया। यह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
जब कार्यक्रम समाप्ति की ओर बढ़ा और प्रो. गौतम बनर्जी ने सभी को जलपान के लिए आमंत्रित करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया, तब मेरे मन में यह संतोष था कि मैंने केवल एक व्याख्यान नहीं सुना, बल्कि एक सार्थक वैचारिक यात्रा का अनुभव किया।
निस्संदेह, यह कार्यक्रम साहित्य और जेन-ज़ी के बीच संवाद की एक सशक्त कड़ी बनकर मेरे स्मृति-पटल पर अंकित हो गया।
झलकियाँ
डॉ राकेश राणा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति
































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