नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे
नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे
बदलाव की शुरुआत स्वयं से
हम अक्सर अपने जीवन में आने वाली परेशानियों का कारण दूसरों को मान लेते हैं। हमें लगता है कि यदि सामने वाला बदल जाए, परिस्थितियाँ बदल जाएँ या लोग हमारी सोच के अनुसार व्यवहार करने लगें, तो जीवन सरल और सुखद हो जाएगा। परंतु क्या कभी हमने यह सोचा है कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से भी हो सकती है? सच तो यह है कि जब हम अपनी नज़र बदलते हैं, तब हमारे सामने के नज़ारे भी बदलने लगते हैं।
मनुष्य की सबसे बड़ी प्रवृत्ति यह है कि वह दूसरों की कमियाँ जल्दी देख लेता है, लेकिन अपने भीतर झाँकने से बचता है। हम अक्सर यह सोचते रहते हैं कि फलाँ व्यक्ति ऐसा क्यों है, रिश्ते वैसे क्यों नहीं हैं, या परिस्थितियाँ हमारे मन के अनुसार क्यों नहीं चल रहीं। जबकि असली प्रश्न यह होना चाहिए कि मैं अपने भीतर क्या सुधार ला सकता हूँ?
जब हम थोड़ी देर रुककर स्वयं का परीक्षण करते हैं, तब हमें समझ आने लगता है कि जीवन में बहुत कुछ हमारे अपने व्यवहार और सोच पर निर्भर करता है। कभी हम अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते, कभी छोटी-छोटी बातों को दिल में बैठा लेते हैं, तो कभी बिना सोचे-समझे दूसरों पर टिप्पणी कर देते हैं। कई बार हम लोगों को जल्दी जज कर लेते हैं और बाद में रिश्तों में दूरियाँ बढ़ जाती हैं।
यही वह क्षण होता है, जहाँ से परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है। जब हम अपनी कमियों को स्वीकार करना सीख जाते हैं, तभी सुधार का रास्ता खुलता है। स्वयं से यह प्रश्न पूछना आवश्यक है—
मैं कितनी बार क्रोधित होता हूँ?
मैं कितनी बार बिना सोचे किसी को आहत कर देता हूँ?
मैं कितनी बार दूसरों की आलोचना करता हूँ?
इन प्रश्नों के उत्तर ही हमें हमारे व्यक्तित्व का दर्पण दिखाते हैं।
जीवन को बेहतर बनाने के लिए केवल विचार नहीं, व्यवहार में भी बदलाव आवश्यक है। अपनी भाषा, अपने शब्दों और अपने व्यवहार को थोड़ा संयमित करना पड़ता है। मधुर शब्द न केवल रिश्तों को सँवारते हैं, बल्कि स्वयं के भीतर भी शांति का अनुभव कराते हैं।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कुछ लोग हमें छोटा महसूस कराने की कोशिश करते हैं या हमारा आत्मविश्वास कम कर देते हैं। ऐसे समय में आवश्यक है कि हम उन लोगों का साथ चुनें जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दें, हमारा मनोबल बढ़ाएँ और हमें गिराने के बजाय उठाने का प्रयास करें। सच्चे संबंध वही होते हैं जो हमें हमारी वास्तविक पहचान से जोड़ते हैं।
जीवन में परफेक्ट बनने की दौड़ से अधिक महत्वपूर्ण है रियल बनना—अपने असली स्वरूप को स्वीकार करना। स्वयं से जुड़ना, स्वयं से संतुष्ट होना और हर दिन थोड़ा-सा बेहतर बनने का प्रयास करना ही आत्मविकास का सच्चा मार्ग है।
अंततः जब हम अपने जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखें, तो मन में यह संतोष हो कि हमने किसी का दिल नहीं दुखाया, क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और उस परमपिता द्वारा दिए गए जीवन को सार्थक ढंग से जिया। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
वास्तव में, नज़र बदलने भर की देर होती है—नज़ारे अपने आप बदलने लगते हैं।
सृजक
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (महिला प्रकोष्ठ)
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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