जो भूल ही नहीं पाए
जो भूल ही नहीं पाए
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने विचारों, प्रेरणा और स्नेह के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के जीवन में भी प्रकाश फैलाते रहते हैं। मेरे आदरणीय चाचाजी, स्वर्गीय बृजेन्द्र मोहन साँख्यधर जी, ऐसे ही प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व थे। उनका जीवन सरलता, संवेदनशीलता और साहित्यिक चेतना से आलोकित था।
वे शब्दों की शक्ति में गहरा विश्वास रखते थे और मानते थे कि लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और समय से संवाद का माध्यम है। जब भी उनसे मुलाकात होती, वे अत्यंत आत्मीयता से लेखन के लिए प्रेरित करते और कहते—
“मन की सच्ची अनुभूति जब शब्दों में ढलती है, तभी वह साहित्य बनती है।”
उनके ये शब्द मेरे लिए सदैव मार्गदर्शक रहे।
उनकी अंग्रेज़ी में लिखी पुस्तक सम्भल का हिन्दी रूपान्तरण मेरे लिए केवल भाषाई परिवर्तन नहीं, बल्कि उनके विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने का एक विनम्र सेतु है।
भागवत पुराण के अनुसार, सम्भल वह पवित्र स्थान है जहाँ कल्कि भगवान, जो कलियुग में अधर्म का विनाश करेंगे, प्रकट होंगे। यह स्थान केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से मानवता, धर्म और न्याय के पुनरुत्थान का प्रतीक भी है। चाचाजी की लेखनी में यही दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है—मानव जीवन के अनुभवों और सामाजिक समझ के साथ आध्यात्मिक चेतना का समन्वय।
अनुवाद करते समय मेरा प्रयास रहा है कि मूल कृति की भावभूमि, उसकी आत्मा और संवेदनात्मक गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे। यदि इस हिन्दी रूपान्तरण के माध्यम से पाठक लेखक की चिंतनशील दृष्टि और अनुभवों की गहराई को अनुभव कर सकें, तो यह मेरे लिए अत्यंत संतोष का विषय होगा। यह कृति उनके प्रति मेरी श्रद्धा, कृतज्ञ स्मृति और स्नेह का विनम्र अर्पण है।
जीवन की स्मृतियों में यदि कोई सबसे गहरी और स्नेहमयी छवि अंकित है, तो वह माँ की है। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है, पर माँ से जुड़े संस्मरण कभी फीके नहीं पड़ते। वे हर परिस्थिति में मन को सहारा देते हैं, जैसे अँधेरे में दीपक की लौ।
जीवन में रिश्तों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, और उनमें सासू माँ का रिश्ता विशेष रूप से अनोखा और स्नेहमयी होता है। यह केवल पारिवारिक बंधन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, सहारा और अनुशासन का आधार भी है।
जब मैंने गृहस्थ जीवन की शुरुआत की, वह समय मेरे लिए नया और चुनौतीपूर्ण था। घर के नियम, परंपराएँ और जिम्मेदारियाँ—सब कुछ अनजान था। उस समय सासू माँ ने मेरी हर गलती को सहन करते हुए मुझे सिखाया। कभी कठोरता से, तो कभी स्नेह से, उन्होंने मेरे जीवन को दिशा दी।
उनके हाथ का बनाया भोजन आज भी स्मृतियों में ताज़ा है—हल्के मसालों की वह सादगी, जिसमें पूरे घर की सुगंध बसती थी। पर केवल भोजन ही नहीं, उनका धैर्य, व्यवहार और सहज ममता ने यह सिखाया कि परिवार को संजोना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रेम और समझदारी का कार्य है।
घर में जब भी कोई तनाव या विवाद होता, उनका शांत स्वर और संतुलित दृष्टिकोण वातावरण को सहज बना देता। उनके शब्द—“धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा”—मेरे लिए हमेशा संबल बने।
एक बार जब मेरे बच्चे पहली बार स्कूल गए और उनकी घबराहट देखकर मैं भी विचलित हो उठी, तब उन्होंने समझाया—
“बेटी, बच्चों को भी कभी अकेले उड़ान भरने देना चाहिए। उनकी छोटी-छोटी नाकामियाँ ही उन्हें मजबूत बनाती हैं।”
यह सीख मेरे जीवन की धरोहर बन गई।
उनका जीवन स्वयं एक अनुकरणीय पाठशाला था—प्रातः जल्दी उठना, परिवार की देखभाल, हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना—ये सब मेरे लिए प्रेरणा बने।
माँ का स्नेह उनके हर छोटे-छोटे कार्यों में झलकता था—थाली में अपना हिस्सा दे देना, बिना कहे हमारी थकान समझ लेना। एक बार जब मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ी, वे पूरी रात मेरे सिरहाने बैठी रहीं। उस रात मैंने जाना कि माँ का प्रेम शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण से व्यक्त होता है।
जब मुझे हृदयाघात हुआ और अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा, तब उनकी चिंता का स्वर मेरे हृदय को छू गया। घर लौटने पर उन्होंने कहा—
“देख री! कोई मुझे बताता ही नहीं, मैं भी अस्पताल चलकर तुझे देख आती।”
उनकी इस शिकायत में छिपा स्नेह और अपनापन मेरे लिए अमूल्य था।
समय के साथ जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, पर उनका स्नेह अटूट बना रहा। जब वे स्वयं बीमार हुईं, उन्होंने मुझसे कहा—
“छाया, मेरे पास रहो, मुझे छोड़कर मत जाना।”
उनके इन शब्दों ने मेरे लिए सेवा को कर्तव्य से आगे बढ़ाकर प्रेम का रूप दे दिया।
मैंने उन्हें केवल सासू माँ नहीं, बल्कि एक पूजनीय व्यक्तित्व के रूप में अपनाया। उनकी सेवा करना मेरे लिए श्रद्धा और आस्था का विषय बन गया। उनके जाने के बाद जीवन में एक गहरा खालीपन रह गया, पर उनकी स्मृतियाँ आज भी मेरे भीतर जीवित हैं।
आज जब मैं अपने पोते को संस्कार देती हूँ, तो हर कदम पर उनका मार्गदर्शन महसूस करती हूँ। उनकी सीख, उनका स्नेह और उनके आदर्श मेरे जीवन का आधार बन चुके हैं।
जब भी मैं अकेली होती हूँ, उनकी यादें चलचित्र की तरह सामने आ जाती हैं—उनकी हँसी, उनकी डाँट, उनका स्नेह। कुछ स्मृतियाँ मुस्कान देती हैं, तो कुछ आँखें नम कर जाती हैं, पर हर याद हृदय को भर देती है।
उनकी विदाई का दिन मेरे जीवन का सबसे कठिन क्षण था। घर भरा हुआ होते हुए भी खाली लग रहा था। हर कोना—रसोई, आँगन, वह पुरानी चौकी—उन्हें पुकार रहा था। तब एहसास हुआ कि माँ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे घर की आत्मा होती हैं।
वास्तव में, माँ का जाना अंत नहीं होता; वे एक ऐसी उपस्थिति बन जाती हैं, जो हर पल हमारे भीतर जीवित रहती है। उनके साथ बिताए गए छोटे-छोटे क्षण ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाते हैं।
माँ, तुम भले ही आँखों से ओझल हो गई हो, पर मेरे हर साँस, हर विचार और हर स्मृति में आज भी जीवित हो—और हमेशा रहोगी।
रचनाकार
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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