भय से नहीं, संवाद और विश्वास से संवरते हैं बच्चों के व्यक्तित्व
भय से नहीं, संवाद और विश्वास से
संवरते हैं बच्चों के व्यक्तित्व
आज के बदलते सामाजिक परिवेश में बच्चों की परवरिश केवल अनुशासन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, संवाद और समझ की भी उतनी ही आवश्यकता है। अक्सर देखा जाता है कि एक ही रूटीन और लगातार दबाव के कारण बच्चे ऊबने लगते हैं। कभी उनका मन थक जाता है, कभी दिमाग उलझ जाता है और कई बार उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लग पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि “ध्यान नहीं लग रहा” जैसे वाक्य के पीछे हमेशा कोई न कोई कारण होता है, लेकिन अभिभावक उस कारण को समझने के बजाय सीधे सख्ती या सज़ा का रास्ता चुन लेते हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ से समस्या शुरू होती है।
बच्चों को सुधारने की मंशा में अक्सर माता-पिता अनजाने में उन्हें डरना सिखा देते हैं। परिणामस्वरूप, बच्चा पढ़ाई से नहीं बल्कि अपने ही अभिभावकों से दूर होने लगता है। डर के कारण वह चुप तो हो जाता है, लेकिन उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। वह पढ़ाई करता जरूर है, पर हर पन्ने के साथ उसका मनोबल टूटता जाता है।
शिक्षाविदों का कहना है कि यदि बच्चा किसी कारणवश पीछे रह रहा है या लड़खड़ा रहा है, तो उसे डांटने या डराने की बजाय उसका साथ देना अधिक आवश्यक है। ऐसे समय में बच्चों को यह सुनने की जरूरत होती है—“क्या हुआ?” न कि यह ताना—“तुमसे यह भी नहीं हुआ।”
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह स्पष्ट है कि जो बच्चे डर के माहौल में बड़े होते हैं, वे भले ही जीवन में सफलता हासिल कर लें, लेकिन उनके भीतर खुशी और आत्मीयता की कमी रह जाती है। कई बार यही डर उन्हें अपनों से दूर कर देता है और उनके मन में नकारात्मक भावनाएँ जन्म लेने लगती हैं।
इस संदर्भ में विशेषज्ञ अभिभावकों को सलाह देते हैं कि बच्चों को इतना भयभीत न करें कि वे अपनी बात कहने से ही कतराने लगें। इसके विपरीत, उन्हें ऐसा वातावरण दें जिसमें वे अपनी हर गलती के बाद भी सबसे पहले अपने माता-पिता के पास आ सकें।
बच्चों के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। जब बच्चा अपने मन की हर बात खुलकर साझा करता है, तभी उसका आत्मविश्वास विकसित होता है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना मजबूती से कर पाता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि बच्चों का सर्वांगीण विकास डर से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और संवाद से ही संभव है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को सख्ती के बजाय स्नेह के साए में बढ़ने का अवसर दें, ताकि वे न केवल सफल, बल्कि एक खुशहाल और संतुलित व्यक्तित्व के रूप में विकसित हो सकें।
प्रमिला त्रिवेदी





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