आज का आत्म उद्गम
आज का आत्म उद्गम
भूमिका
मानव जीवन केवल समय की निरंतरता नहीं, बल्कि भावों की गहराई और आत्मा की जागृति का एक सतत प्रवाह है। जब हम प्रत्येक दिन को केवल दिनचर्या का हिस्सा मानकर जीते हैं, तो जीवन एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। किंतु जब उसी दिन को “आत्म उद्गम” — अर्थात् भीतर से प्रस्फुटित होने वाले नवचेतन स्रोत — के रूप में देखा जाता है, तब वही साधारण दिन असाधारण अनुभवों में परिवर्तित हो जाता है।
किशोर कुमार धनावत जी की प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी आत्मजागरण की ओर संकेत करती हैं। ये पंक्तियाँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि उत्साह कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि भीतर से उपजने वाली ऊर्जा है, जिसे हर दिन पुनः जागृत किया जा सकता है। “हर दिन उत्साह का, खुशी से मनायें हम” — यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है, जो हमें वर्तमान क्षण को उत्सव की तरह जीने की प्रेरणा देता है।
इन पंक्तियों में स्नेह और समर्पण को समझने का आग्रह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज के समय में जहाँ संबंध अक्सर औपचारिकता और स्वार्थ के बीच उलझ जाते हैं, वहाँ “भाव को जानें हम” एक गहरी पुकार है — अपने भीतर के संवेदनशील मनुष्य को पहचानने की। सच्चा स्नेह और समर्पण वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के, सहज रूप से प्रवाहित होता है।
“प्रेम-दीप की ज्योत, मन में जलायें हम” — यह पंक्ति आंतरिक प्रकाश की बात करती है। यह वह दीप है जो अंधकार को दूर करने के लिए बाहर नहीं, भीतर जलाया जाता है। जब मन में प्रेम का दीप प्रज्वलित होता है, तब जीवन की कठिनाइयाँ भी मार्गदर्शक बन जाती हैं।
अंततः, “देखा-देखी न करें, संस्कृति बचायें हम” — यह एक सामाजिक चेतावनी और उत्तरदायित्व दोनों है। आधुनिकता के अंधानुकरण में हम अक्सर अपनी मूल पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों को भूलने लगते हैं। यह पंक्ति हमें सचेत करती है कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं, बल्कि उन्हें संजोते हुए आगे बढ़ना है।
इस प्रकार, ये पंक्तियाँ केवल काव्य नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक आयाम — व्यक्तिगत, भावनात्मक और सामाजिक — को दिशा देने वाली एक सशक्त प्रेरणा हैं। यह रचना हमें आत्मचिंतन, आत्मविकास और सांस्कृतिक संरक्षण की ओर अग्रसर करती है, जिससे जीवन न केवल सार्थक, बल्कि सच में “उत्सवमय” बन सके।
आत्म उद्गम
आज का आत्म उद्गम
हर दिन उत्साह का,
खुशी से मनायें हम।
स्नेह और समर्पण,
भाव को जानें हम।
प्रेम-दीप की ज्योत,
मन में जलायें हम।
देखा-देखी न करें,
संस्कृति बचायें हम।
रचनाकार





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