स्वयं के लिए भी एक क्षण
स्वयं के लिए भी एक क्षण
भूमिका
स्त्री जीवन की धुरी है—वह अपने स्नेह, त्याग और समर्पण से परिवार को सहेजती है, उसे संवारती है और हर छोटी-बड़ी ज़रूरत को पूरा करने में अपना सर्वस्व लगा देती है। परंतु इस सतत प्रवाह में कहीं उसका अपना अस्तित्व, उसकी इच्छाएँ और उसका विश्राम पीछे छूट जाता है। प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना उसी अनकहे सत्य को स्वर देती है कि स्त्री केवल दूसरों के लिए ही नहीं, स्वयं के लिए भी जीने का अधिकार रखती है। यह कविता हर उस स्त्री की आंतरिक पुकार है, जो जिम्मेदारियों के बीच अपने लिए कुछ पल चुराकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है।
अभिव्यक्ति का काव्य रूप
सृष्टि की प्रत्येक स्त्री ऐसा करती है और करना भी चाहिए कि थोड़ा-बहुत वक्त अपने लिए भी निकालना चाहिए। मैंने एक साथ सब स्त्रियों के मन की बात लिखने की कोशिश की है।
स्त्री
दिन भर बच्चों के पीछे भागती हूँ।
सारे घर को समेटती रहती हूँ
पर रात को जब सो जाते है सारे ,
ख़ुद के लिए समय ज़रूर निकाल लेती हूँ।
बच्चों की परवरिश ज़रूरी
पति की फ़रमाइश ज़रूरी
घर की देखभाल भी ज़रूरी
पर, ख़ुद का ख़याल सबसे ज़रूरी
कभी कभी काम को
देरी से निपटा लेती हूँ
पर ख़ुद के लिए समय
ज़रूर निकाल लेती हूँ।
किड्स को ऐक्टिव बनाने में
हब्बी को अट्रैक्टिव बनाने में
एंड हाउस को इम्प्रेसिव बनाने में
ख़ुद को डल,महसूस, नहीं होने देती हूँ
ख़ुद के लिए समय ज़रूर निकाल लेती हूँ।
बच्चों की ख़्वाहिशों को पूरा करते करते
घर की आवश्यकताओं को भरते भरते
चुपके से अपने शौक़ को भी
खंगाल लेती हूँ
ख़ुद के लिए समय ज़रूर निकाल लेती हूँ।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी
अभिव्यक्ति आधारित आलेख
स्त्री का दिन प्रायः दूसरों के नाम से शुरू होता है और उन्हीं के नाम पर समाप्त भी हो जाता है। सुबह की पहली किरण के साथ ही वह बच्चों की देखभाल, घर की साफ-सफाई, रसोई के काम और परिवार की अनगिनत आवश्यकताओं में स्वयं को समर्पित कर देती है। उसका हर कदम, हर प्रयास किसी न किसी और की सुविधा और खुशी के लिए होता है।
बच्चों की परवरिश में वह अपने सपनों को ढाल देती है, पति की इच्छाओं में अपनी प्राथमिकताओं को समेट लेती है और घर की व्यवस्था में अपनी थकान को भूल जाती है। उसके लिए “ज़रूरी” शब्द का अर्थ हमेशा दूसरों की ज़रूरतों से जुड़ा होता है।
किन्तु इस व्यस्त और थकाऊ दिनचर्या के बीच एक सच्चाई यह भी है कि यदि स्त्री स्वयं को न संभाले, तो वह दूसरों को भी संपूर्ण रूप से नहीं संभाल सकती। यही कारण है कि प्रमिला त्रिवेदी जी की रचना में स्त्री अपने लिए समय निकालने का संकल्प लेती है। वह जानती है कि स्वयं का ख्याल रखना कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि एक आवश्यक संतुलन है।
रात के सन्नाटे में, जब पूरा घर नींद की आगोश में होता है, तब वह कुछ पल अपने लिए चुरा लेती है—कभी अपने शौकों को याद करती है, कभी अपने मन की थकान को सहलाती है, तो कभी अपनी पहचान को टटोलती है। यह वही समय होता है, जब वह केवल “माँ” या “पत्नी” नहीं, बल्कि “स्वयं” होती है।
आज की स्त्री केवल दूसरों को संवारने तक सीमित नहीं रहना चाहती, वह अपने भीतर के उजाले को भी बनाए रखना चाहती है। वह अपने बच्चों को सक्रिय, अपने जीवनसाथी को आकर्षक और अपने घर को सुंदर बनाने के साथ-साथ खुद को भी जीवंत और आत्मविश्वासी बनाए रखना चाहती है।
यह आलेख इसी विचार को पुष्ट करता है कि स्त्री का स्वयं के लिए समय निकालना एक विलासिता नहीं, बल्कि उसका मौलिक अधिकार है। जब वह अपने लिए कुछ क्षण संजोती है, तब वह और अधिक सशक्त, संतुलित और प्रसन्न बनकर अपने परिवार को भी खुशहाल बना सकती है।
अंततः, एक संतुलित और सुखी जीवन का आधार यही है कि स्त्री अपने दायित्वों के साथ-साथ अपने अस्तित्व को भी महत्व दे—क्योंकि जब वह स्वयं को संजोती है, तभी वह संसार को सहेजने की शक्ति रखती है।
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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