“मैं लेखिका नहीं… फिर भी लिखती हूँ” प्रमिला जी का आत्मकथ्य

“मैं लेखिका नहीं… फिर भी लिखती हूँ” प्रमिला जी का आत्मकथ्य

मैं अक्सर खुद से कहती हूँ— *“मैं कोई लेखिका नहीं हूँ…”*

और यह कहते हुए मेरे भीतर कोई हीनता नहीं, बल्कि एक सच्चाई की सादगी होती है। क्योंकि लेखिका होने का जो मानक दुनिया ने तय किया है—भारी-भरकम शब्द, गूढ़ विचार, अलंकारों की जटिलता—उससे मैं आज भी दूर हूँ।

लेकिन फिर भी…

मेरे भीतर एक संसार है—कल्पनाओं का, अनुभूतियों का, भावनाओं का—जो किसी भी शब्दकोश से कहीं अधिक विशाल है।

मैंने कभी शब्दों को ओढ़ने की कोशिश नहीं की,

मैंने उन्हें जीने की कोशिश की है।

मेरी लेखनी में कोई जटिलता नहीं,

बस मन की सच्चाई है।

मैं वही लिखती हूँ जो महसूस करती हूँ,

और शायद यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

कभी-कभी मैं सोचती हूँ—

क्या सच में लेखन केवल विद्वानों का अधिकार है?

क्या साधारण शब्दों में लिखी गई भावनाएँ कम मूल्यवान होती हैं?

नहीं।

क्योंकि मैंने देखा है—

कई बार सरल शब्द सीधे दिल तक पहुँच जाते हैं,

जबकि जटिल शब्द दिमाग़ में ही उलझ कर रह जाते हैं।

मैं मानती हूँ कि हम सबके भीतर एक कलाकार छिपा है।

कोई उसे पहचान लेता है,

कोई उसे दबा देता है,

और कोई… मेरी तरह… धीरे-धीरे उसे शब्दों में ढालने की कोशिश करता है।

मैं कोई बड़ी रचनाकार नहीं हूँ,

लेकिन मैं एक कोशिश हूँ—

अपने ही भीतर छिपे उस कथाकार को पहचानने की।

जब मैं लिखती हूँ,

तो मुझे यह चिंता नहीं होती कि लोग मुझे “कवि” कहेंगे या नहीं।

मुझे बस यह संतोष होता है कि

मैंने अपने मन के किसी कोने को हल्का कर लिया।

हाँ, कुछ लोग अपनी लेखनी से अमिट छाप छोड़ जाते हैं—

वे सच में कवि होते हैं, शब्दों के शिल्पकार।

मैं उनसे तुलना नहीं करती,

मैं उनसे प्रेरणा लेती हूँ।

मेरा उद्देश्य महान बनना नहीं,

सतत बने रहना है।

मैं हर दिन जीवन के रंगों को समेटने की कोशिश करती हूँ—

खुशी, पीड़ा, संघर्ष, आशा, प्रतीक्षा—

और उन्हें अपनी भाषा में, अपने ढंग से,

कागज़ पर उतार देती हूँ।

यदि मेरी यह साधारण सी लेखनी

किसी ऐसे व्यक्ति को प्रेरित कर सके

जो यह सोचकर लिखना छोड़ देता है कि

“मुझे शब्द नहीं आते…”

तो मैं कहना चाहूँगी—

शब्द नहीं, भाव ज़रूरी होते हैं।

शैली नहीं, सच्चाई महत्वपूर्ण होती है।

आप लिखिए…

जैसे बोलते हैं, वैसे लिखिए…

जैसे महसूस करते हैं, वैसे लिखिए…

क्योंकि—

लेखक वही नहीं होता जो शब्दों में महान हो,

लेखक वह होता है जो भावों में सच्चा हो।

आज भी मैं खुद को लेखिका नहीं मानती…

पर शायद लिखते-लिखते,

मैं अपने ही भीतर एक लेखिका को जन्म दे रही हूँ।

और यही मेरी यात्रा है—

सरल, सच्ची और निरंतर… 🍁

रचनाकार

 
प्रमिला जी त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका 
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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