कुटुम्ब
डिजिटल दुनिया
भूमिका
डिजिटल युग ने मानव जीवन को जितनी सुविधाएँ दी हैं, उतने ही गहरे प्रश्न भी हमारे सामने खड़े कर दिए हैं। आज तकनीक ने सचमुच दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है—एक छोटा-सा मोबाइल फोन हमें दूर बैठे लोगों से पल भर में जोड़ देता है। परन्तु इसी सुविधा के साथ एक विडम्बना भी जन्मी है कि हम आभासी दुनिया से तो जुड़े जा रहे हैं, पर वास्तविक संबंधों से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं।
कभी परिवार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं का विशाल संसार होता था। संयुक्त परिवारों में रिश्तों की गरमाहट, आपसी संवाद और साथ बैठने-बतियाने की संस्कृति जीवन को अर्थ देती थी। समय बदला, परिवार छोटे हुए, फिर और छोटे होते चले गए। अब स्थिति यहाँ तक पहुँचती दिखाई दे रही है कि व्यक्ति अपने ही संसार में सिमटता जा रहा है—जहाँ उसके साथ उसका मोबाइल तो है, पर मन के रिश्ते कम होते जा रहे हैं।
इन्हीं बदलते सामाजिक परिदृश्यों और मनुष्य के भीतर बढ़ती एकाकी भावना को बड़ी सरल, सहज और चिंतनशील शैली में अभिव्यक्त करती है प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना डिजिटल दुनिया — कुटुम्ब। यह कविता केवल तकनीक की चर्चा नहीं करती, बल्कि उस सूक्ष्म परिवर्तन को भी उजागर करती है जहाँ परिवार की परिभाषा सिमटती-सिमटती व्यक्ति तक आकर ठहरने लगी है।
यह रचना हमें ठहरकर सोचने का अवसर देती है—क्या सचमुच प्रगति के इस दौर में हम कहीं अपने रिश्तों की गर्माहट तो नहीं खोते जा रहे? और क्या अभी भी समय है कि हम डिजिटल दुनिया के साथ-साथ अपने वास्तविक कुटुम्ब और मानवीय संबंधों को भी उतनी ही संवेदनशीलता से सहेज सकें।
आइए, इस विचारोत्तेजक रचना पर एकाग्र होकर चिंतन करें।
।।कुटुम्ब।।
कुछ भी नहीं रहा अछूता,
हम यह बोल सकते हैं,
अब दुनिया मुठ्ठी में है
याने मोबाइल हाथ में है,
पर, मन बहुत संकुचित हो गए हैं,
सिर्फ अपने तक ही सीमित हो गए हैं।
सोचते हैं, भले पास में कोई बैठा
पर हर थोड़ी देर में फोन देखते हैं,
इसी पर है एक रचना,
गौर फरमाइए,
पहले का एकत्र कुटुम्ब,
देखते ही देखते,
अब विभक्त हो गया है,
पहले, हम दो हमारे दो थे,
फिर हम दो हमारा एक हुआ,
अब तो बस हो गया,
अब एक का भी कौन करेगा,
एक भी नही,
और! अब शादी भी क्यों करना है?
लिव-इन शुरू हुआ था,
अब तो वो भी नहीं,
अब तो अकेले ही रहना
ठीक लगने लगा,
मेरे लिए मैं ही कुटुम्ब,
मैं ही परिवार,
अब मेरे लिए मैं,
तेरे लिए तू,
करते-करते,
कुछ भी तो नहीं बचा, अपना,
कोई भी नही अपना।।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी







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