धम्मू जी के मनोभाव

जीवन की निष्ठुरता

भूमिका

धम्मू जी दमदमा की ये पंक्तियाँ जीवन के उस सूक्ष्म और कभी-कभी कटु सत्य को सामने लाती हैं, जहाँ समय, संघर्ष और मनुष्य का अंतर्मन एक साथ संवाद करते दिखाई देते हैं। मनुष्य जीवन भर अपने कर्मों, अपनी लिखी-अनलिखी कथाओं और अपने ही बनाए हिसाब-किताब से जूझता रहता है। कभी लगता है कि बहुत कुछ लिखा, बहुत कुछ किया, पर फिर भी समय अपने ढंग से सबका मूल्यांकन करता रहता है।

इन पंक्तियों में समय की कठोरता, जीवन की विडम्बना और मनुष्य की स्वतंत्र होकर जीने की चाह—तीनों का गहरा स्पर्श मिलता है। कवि मानो यह प्रश्न उठाता है कि क्या जीवन केवल हिसाब-किताब और दबाव में जीने का नाम है, या फिर मनुष्य को अपने अस्तित्व को पूरे विस्तार और स्वाभाविकता के साथ जीना चाहिए।

इसी जीवनानुभूति, समय की निष्ठुरता और मनुष्य की भीतर उठती बेचैनी को स्वर देती हुई धम्मू जी दमदमा की ये पंक्तियाँ पाठक को ठहरकर सोचने के लिए विवश करती हैं। यहाँ शब्द केवल कविता नहीं रहते, बल्कि जीवन के अनुभवों का आईना बन जाते हैं। 

🌹🙏

जीवन की निष्ठुरता

🙏🌹🌹❤️❤️🙏

फूल मुरझा गए, पता है क्यों?

समय को ढूंढता हो रहा मखोल!!

समय बड़ा वाजिब है, मिला हिसाब से!

जूझता रहता इंसान हर पिछली किताब से!!

लिखे बहुत 

बहुत लिखे

बेहिसाब से 

करीने की सौगात 

बात पर बात 

सब हिसाब से 

जीना भी क्या जीना 

पड़े जीना दवाब से

अपना जीना खुद का जीना 

जीना ही तो भरपूर जीना 

समय 

निष्ठुर 

आनंद को करें तनकधिन

है बड़ा निष्ठुर कमीना 

🙏🌹🌹❤️❤️🙏

रचनाकार

धम्मू जी दमदमा

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



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