मन की शल्य चिकित्सा

 मन

भूमिका

मन—यह एक ऐसा रहस्य है, जिसे हमने महसूस तो किया है, पर कभी देखा नहीं। यह हमारे भीतर होते हुए भी हमसे परे है; कभी पवन-सा उन्मुक्त, कभी पंछी-सा उड़ता, तो कभी पारे-सा हाथ से फिसल जाता है। प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता उसी चंचल, अनियंत्रित और फिर भी असीम मन के स्वरूप को स्पर्श करती है।

यह रचना केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि आत्मा और विचारों के बीच चलने वाला एक सूक्ष्म संवाद है। कवयित्री ने मन की लहरों, उसकी गति, उसकी अनिश्चितता और उसके विस्तार को अत्यंत सहज उपमाओं में बाँधकर पाठक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित किया है। कभी यह मन क्षुद्र कण-सा लगता है, तो कभी समूचे आकाश को भी छोटा कर देने वाला विराट रूप ले लेता है।

इस कविता के माध्यम से एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभरता है—क्या मन को साधा जा सकता है? और यदि हाँ, तो कैसे? इसका उत्तर कवयित्री ईश्वर-चिन्तन, एकाग्रता और मोह-माया से विमुक्ति में खोजती हैं। यह केवल आध्यात्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अनुभवों से उपजा सत्य है।

प्रस्तुत पेंसिल आरेख इसी भावभूमि को बिना शब्दों के अभिव्यक्त करने का एक प्रयास है। इसमें मन की चंचलता, उसकी उड़ान, उसके बंधन और उसकी मुक्ति—सब कुछ प्रतीकों के माध्यम से उकेरा गया है। यह चित्र और कविता मिलकर एक ऐसा सेतु बनाते हैं, जहाँ पाठक न केवल देखता और पढ़ता है, बल्कि महसूस भी करता है।

आइए, इस रचना के साथ कुछ पल ठहरें… और अपने ही मन से एक संवाद आरंभ करें।

कविता

।।मन।।

मन को नियंत्रित करने के लिए, 

मन को साधना है,

मन बड़ा चंचल है,

पारे की तरह हाथ से फिसल जाता है,

मन कैसा है जिसे किसी ने देखा ही नही,

वो कैसा दिखता है

मन लहरी है उसे कोई पकड़ नही सकता,

मन जैसे पवन हो उन्मुक्त सी,

मन पंछी जैसा एक क्षण में उड़ जाता है,

अभी अभी तो यहीं था 

अब आकाश में दिखाई दे रहा है,

मन कितना छोटा सा,

जैसे खसखस का दाना,

और वो हमारे शरीर में कहाँ रहता है?

कोई नहीं जानता?

क्या हम मन की शल्य चिकित्सा 

कर सकते हैं (सर्जरी)

वहीं मन कितना विशाल?

जैसे आकाश भी कम पड़ जाए, 

मन पल पल बहता, लहरों के जैसे

मन चंचल बहुत उसे नहीं जरा धीर,

हे ईश्वर?  कैसे तूने मन की रचना करी,

ऐसा कैसा रे तू योगी, कैसे किया तूने आविष्कार 

कैसे तूने ये करामात करी,

क्या तुझे सपना आया मानव की रचना करते हुए, 

पर उस मन को जब हम बांधना चाहें

तो कहाँ बस चलता है मन पर 

एकाग्र होता नहीं जल्दी से,

पूरी दुनिया की सैर करके आ जाता है।

पल भर में, मन को साधने के लिए, 

ईश्वर में ध्यान लगाना,

सारी मोह माया से मन हटाना,

पूरे जगत को एक सपना समझना पडता है।

रचनाकार

 
प्रमिला त्रिवेदी जी 
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






प्रमिला त्रिवेदी 

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