शहीदों को नमन, संकल्पों का उजास
आंखों देखा हाल
शहीदों को नमन, संकल्पों का उजास
23 मार्च… वातावरण में एक अलग ही गंभीरता और श्रद्धा का भाव था। मैं, डॉ. नाज़ परवीन, जब श्री द्रोणाचार्य (पी जी) कॉलेज परिसर में पहुँची, तो ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो और हर कोना उन अमर बलिदानों की गवाही दे रहा हो, जिन्होंने इस मिट्टी को स्वतंत्रता का स्वाभिमान दिया।
कार्यक्रम का आरंभ जैसे ही हुआ, मंच पर सजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चित्रों पर पुष्प अर्पित किए गए। उस क्षण उपस्थित हर व्यक्ति की आँखों में आदर था और हृदय में गर्व। दो मिनट का मौन… पर यह मौन केवल शांति नहीं, बल्कि उन बलिदानों के प्रति गहरी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति था।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. राजीव पांडेय ने जब 23 मार्च 1931 के उस ऐतिहासिक क्षण का उल्लेख किया, तो लगा जैसे इतिहास हमारे सामने जीवंत हो उठा हो। उनके शब्दों में केवल तथ्य नहीं, बल्कि वह भावनात्मक ऊर्जा थी जो युवाओं को जागृत करने की क्षमता रखती है।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गिरीश कुमार वत्स जी ने अपने संबोधन में शहीदों के बलिदान को केवल अतीत की घटना न मानकर, वर्तमान और भविष्य की दिशा बताया। उनके शब्दों ने विद्यार्थियों के भीतर एक नई जिम्मेदारी का बोध जगाया—कि देशभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि कर्म का विषय है।
उप प्राचार्या डॉ. रश्मि गुप्ता जी ने जब शहीदों के जीवन और विचारों पर प्रकाश डाला, तो लगा कि उनके संघर्ष और आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वहीं, डॉ. देवानंद सिंह जी की आवाज़ में गर्व था जब उन्होंने कहा कि भगत सिंह की बहादुरी के किस्से सदियों तक सुनाए जाएंगे—और सच ही है, कुछ नाम समय के साथ नहीं मिटते, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होते जाते हैं।
विज्ञान विभाग के अध्यक्ष श्री अमित नागर जी ने युवाओं के भीतर जीवित क्रांतिकारी चेतना की बात कही, तो डॉ. राघव के शब्दों में आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश स्पष्ट था—देशप्रेम केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि जीने का तरीका है।
जब मैंने स्वयं अपने विचार साझा किए, तो मन में यही भाव था कि इन शहीदों की शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी और अंग्रेजी शासन को यह स्पष्ट संकेत दिया कि भारत अब जाग चुका है।
कार्यक्रम के अंत में जब सभी ने राष्ट्र की एकता, अखंडता और प्रगति के लिए संकल्प लिया, तो वह केवल औपचारिकता नहीं थी—वह एक सामूहिक प्रतिज्ञा थी, एक नई ऊर्जा का संचार था।
उस दिन मैंने केवल एक कार्यक्रम नहीं देखा…
मैंने देखा—श्रद्धा का सागर, प्रेरणा का उदय और संकल्पों का नव निर्माण।
और मन ने कहा—
शहीद सच में अमर होते हैं, क्योंकि वे केवल इतिहास में नहीं, बल्कि हर जागरूक हृदय में जीवित रहते हैं।









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