दैनिक सृजन (काव्य रचना भूमिका के साथ)
दैनिक सृजन
भूमिका
जब मन संवेदनाओं से भीगता है, तब शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते—वे रिश्तों का विस्तार बन जाते हैं। श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी की यह रचना इसी भावभूमि पर जन्म लेती है, जहाँ एक साधारण-सा घर का बगीचा भी जीवंत होकर संवाद करने लगता है। यह संवाद केवल फूल-पत्तियों का नहीं, बल्कि उस अनदेखे, अनकहे रिश्ते का है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच अनादि काल से बसा हुआ है।
अक्सर हम संसार की बड़ी-बड़ी बातों को शब्दों में पिरोते रहते हैं, पर अपने आसपास की उस हरियाली को भूल जाते हैं, जो हर दिन बिना कुछ कहे हमें जीवन का रस देती है। यह रचना हमें उसी विस्मृति से बाहर निकालती है—जहाँ बगीचा केवल सजावट नहीं, बल्कि हमारे जीवन का सहभागी बनकर सामने आता है। उसकी “शिकायत” दरअसल हमारी संवेदनहीनता पर एक कोमल प्रश्न है।
लेखिका ने बड़ी सहजता से यह दर्शाया है कि प्रकृति केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि आभार की अधिकारी है। बगीचे के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया है कि जिस प्रकृति से हमारा हर सुख जुड़ा है—वही हमारे शब्दों, हमारे प्रेम और हमारी कृतज्ञता की भी हकदार है।
यह रचना पाठक को आत्ममंथन के उस बिंदु तक ले जाती है, जहाँ वह स्वयं से पूछता है—क्या हमने कभी अपने जीवन के उन मौन साथियों के लिए भी कुछ कहा, कुछ लिखा, जो हर पल हमें संवारते रहते हैं?
इसी संवेदनशील विचार के साथ यह रचना न केवल प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण करती है, बल्कि हमें उसके प्रति अपने दायित्व का भी बोध कराती है।
कविता
आज मेरे घर का बगीचा
कहने लगा मुझसे,
सभी पर अपनी रचनाएं
लिखती हो,
क्या कभी मुझ पर कुछ लिखा तुमने,
मैं भी सोचने लगी
सच ही तो है
जिसने मुझे इतने सुन्दर पुष्प,
फल दिये उनके प्रति मेरा भी तो फर्ज है,
मेरे कान्हा का श्रंगार भी तो इसी से सजता है
मेरे घर का ड्रॉइंगरूम, इसी से महकता है,
और! क्या कहूं हमारे बालों में गजरा
इसी से दमकता है,
तो आज मेरे रूठे हुए बगीचे को मनाना है,
आज तो उसे मनाना ही होगा
उसकी शिकायते सुन लो,
आज मेरे घर का बगीचा
शिकायत कर रहा था मुझसे
औऱ! कह बैठा मुझसे...
क्या तूने कभी लिखा मेरे बारे में
क्या तूने कभी लिखा मेरी खूबसूरती के बारे में
मुझे तो तुमने अपनी इच्छा से ही लगाया था ना
जिसे तुमने अपनी इच्छा से पाला पोसा है ना
क्या तूने कभी लिखा अपने आंगन की शान
मतलब मेरे बारे में जिसकी हरियाली भाती है तुम्हें
हर पल जिसकी शाखाओं के फूल देख तुम
खुश होती हो, खिलखिलाती हो, मुस्कुराती हो
क्या तूने कभी लिखा पेड़ की पत्तियों के बारे में
आखिर क्यों नही लिखा…?
मैंने कहा, तुमसे ही तो सारी सृष्टि सजती है
तुम तो ईश्वर की कृपा से ही इस धरा पर आई हो,
तुम नहीं होतीं तो दुनिया कितनी वीरान होती,
हर तरफ सूखा और सब तरफ खामोशी पसरी होती,
ईश्वर की बड़ी कृपा है जो प्रकृति तुम हमें मिलीं
ऐसे ही हम पर खुश रहना और!
इस धरा को हरा-भरा बनाए रखना।
प्रकृति का सौंदर्य अद्वितीय और अनंत है।
यह हमें जीवन की सच्चाई और सुंदरता का एहसास कराता है।
प्रकृति में हरियाली, पुष्प, पेड़, पहाड़, नदियाँ, और आकाश
जैसी अनगिनत सुंदर चीजें हैं
जो हमारे जीवन को खुशियों से भर देती हैं।
रचनाकार






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