रक्त-रंजित मानचित्र - बारूद के धुएँ में सुलगती वैश्विक शांति
रक्त-रंजित मानचित्र
बारूद के धुएँ में सुलगती वैश्विक शांति
आज दुनिया जिस मुकाम पर खड़ी है, वहाँ विकास की बातें केवल किताबी लगती हैं। पश्चिम एशिया के आसमान में तारों की जगह मिसाइलें चमक रही हैं और हवाओं में ऑक्सीजन के स्थान पर बारूद का धुआँ घुला है। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, जिसमें अमेरिका जैसी महाशक्तियों की सक्रियता भी जुड़ गई है, केवल दो देशों का संघर्ष नहीं है। यह आधुनिक सभ्यता के उस विरोधाभास को उजागर करता है जहाँ तकनीक का उपयोग जीवन बचाने से अधिक विनाश के लिए हो रहा है।
सत्ता की बिसात और मोहरों की बेबसी
इतिहास गवाह है कि युद्ध आम जनता की मेज़ पर तय नहीं होते। वे सत्ता के गलियारों—जैसे White House के ओवल ऑफिस या तेहरान के सुरक्षा कक्षों—में बंद दरवाज़ों के पीछे रचे जाते हैं। आदेश देने वाले सुरक्षित बंकरों में रहते हैं, जबकि उनकी कीमत वह पिता चुकाता है जिसका घर मलबे में बदल जाता है, या वह माँ जिसकी गोद एक विस्फोट में सूनी हो जाती है।
सत्ता की इस शतरंज में आम इंसान केवल एक ‘संख्या’ बनकर रह गया है। जिसे ‘रणनीतिक बढ़त’ कहा जाता है, वह दरअसल मासूमों की पीड़ा का दूसरा नाम है।
विकास के नाम पर विनाश
हम 21वीं सदी में मंगल ग्रह पर बसने का सपना देखते हैं, लेकिन धरती पर ऐसी मिसाइलें बना रहे हैं जो पलक झपकते ही शहरों को खंडहर बना सकती हैं। जो संसाधन शिक्षा, स्वास्थ्य और भूख मिटाने में लगने चाहिए, वे हथियारों पर खर्च हो रहे हैं।
रक्त से भीगी मिट्टी पर खुशहाली का फूल नहीं खिलता। विकास का अर्थ केवल ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि सुरक्षित बचपन और भयमुक्त जीवन है। जब वातावरण ही हिंसा से भरा हो, तो विकास के दावे खोखले लगते हैं।
इतिहास का निष्पक्ष न्याय
विजेता अक्सर अपना इतिहास स्वयं लिखते हैं, लेकिन समय सबसे बड़ा न्यायाधीश होता है। आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि किसकी मिसाइल कितनी दूर तक गई; वे पूछेंगी कि जब इंसानियत रो रही थी, तब विश्व नेता क्या कर रहे थे।
युद्ध से शांति नहीं जन्म लेती; वह केवल प्रतिशोध की नई श्रृंखला शुरू करता है। बारूद की गंध के साथ उगने वाला सवेरा मानवता को शर्मिंदा ही करेगा।
समय की अंतिम पुकार
अब भी अवसर है। यदि नफ़रत की आग को संवाद और कूटनीति से नहीं बुझाया गया, तो यह किसी एक सीमा तक सीमित नहीं रहेगी। अमन कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। सच्ची जीत लाशों के ढेर पर नहीं, बल्कि जीवित दिलों के विश्वास पर मिलती है।
हथियारों को शांत होना होगा, तभी इंसानियत की आवाज़ सुनी जा सकेगी।
रचनाकार
डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
स्थानीय संपादिका,
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अहमदाबाद (गुजरात)
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति





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